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"बाबरा कोई सनम न था"

                
                                                         
                            तेरे फ़िराक़ से बढ़कर कोई ग़म न था,
                                                                 
                            
दिल में मगर तेरे सिवा कोई सनम न था।
हमने तो तेरी राह में ख़ुद को लुटा दिया,
तेरी निगाह में मगर इतना करम न था।
वो शख़्स जिसकी ख़ातिर ज़माना छोड़ आए,
उसके दिल में हमारे लिए कोई भरम न था।
हमने जिसे समझा था मोहब्बत का देवता,
उसके लिए तो इश्क़ कोई धर्म न था।
वो बेवफ़ा था, फिर भी शिकायत न कर सके,
शायद हमारे दिल में जफ़ा का चलन न था।
हमने तो अपने ज़ख़्म तमाशा नहीं किए,
दर्द इतना गहरा था कि आँखों में नम न था।
महफ़िल में मुस्कुराते रहे उम्र भर मगर,
तन्हाई में हमारे सिवा कोई हमदम न था।
वो आख़िरी निगाह जो तुमने उठाई थी,
उसके बाद आँखों में कोई मौसम न था।
हम मर गए तो शहर ने मातम किया बहुत,
ज़िंदा थे जब किसी को हमारा भी ग़म न था।
‘बाबरा’ हम उसके इश्क़ में क्या-क्या नहीं हुए,
बस एक बात थी—हमें ख़ुद पर भरम न था।
-सुशील कुमार 'बाबरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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