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"बाबरा-यादें और तन्हाई का दर्द"

                
                                                         
                            शाम-ए-अलम ढली है मगर दिन ढला नहीं,
                                                                 
                            
दिल में जो दर्द था वो किसी से कहा नहीं।
दीवार-ओ-दर से पूछते फिरते हैं रास्ता,
मुद्दत हुई कि घर का कोई आसरा नहीं।
हम तो ख़ामोश रह के भी बदनाम हो गए,
उसने सुना वो शिकवा जो लब से अदा नहीं।
काग़ज़ पे बह गए जो कभी अश्क सूख कर,
उन दाग़-ए-हसरतों की कोई इंतहा नहीं।
बचपन की इक हँसी थी जो खोई कहीं पे कल,
बूढ़े दिनों में उस सा कोई रतजगा नहीं।
चेहरे पे गर्द-ए-वक़्त ने लिक्खे हैं जो निशाँ,
आईना देख कर भी कोई फ़ासला नहीं।
अहबाब से गिला हो तो किस बात का करें,
जब ज़िंदगी से ही कोई नाता बचा नहीं।
जलते हुए चराग़ को तूफ़ाँ से क्या ख़लिश,
जिसको हवा का खौफ़ ज़रा सा लगा नहीं।
दामन समेट कर जो गुज़ारे हैं सब बरस,
सहरा में कोई पैर का नक़्श-ए-सदा नहीं।
तन्हाइयों की छाँव में जीते हैं 'बाबरा',
अब रूह को भी कोई नया सिलसिला नहीं।
-सुशील कुमार 'बाबरा'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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