तेरे नाज- नखरे उठानी पड़ेगी
हकीकत कभी तो बतानी पड़ेगी
कहीं ठोकरें कोई देगा हमें भी
कहीं रात रोकर बितानी पड़ेगी
ये उलझन हमारी हमी जानते हैं
तुझे दास्ताँ सब सुनानी पड़ेगी
ये क़िरदार हिस्से में आए हैं रोते
कहानी जुदा फिर बनानी पड़ेगी
यूँ रौंदा है बेरहम फूलों को तुमने
बगीचे को नरमी दिखानी पड़ेगी
वो आए कहीं के मसीहा के जैसे
तबीयत से मय्यत उठानी पड़ेगी
है नादान कितना मेरा दिल अभी तक
दवा सोच की कुछ पिलानी पड़ेगी
वो चिपका गया है जबीं इश्तिहारें
गो पहली ही फुरसत हटानी पड़ेगी
मुझे फूल से प्यार इतना नहीं था
मगर बस जुड़े में सजानी पड़ेगी
-सुशीलयादव
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