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सीख लो तुम भी ज़माने से मुहब्बत करना

                
                                                         
                            सीख लो तुम भी ज़माने से मुहब्बत करना
                                                                 
                            
किस इलाके में नसीहत से बगावत करना

ठीक रहने नहीं देती कहीं दुनिया हमको
वक्त की राह में वाजिब था मुसीबत करना

गर ये जायज तुझे लगता है अमीरों का घर
बस वो माकूल समझ रोज इबादत करना

कोई ठहरा नहीं होगा तिरे दर पे ज़्यादा
तू ने चाहा है कहीं रोज सियासत करना

कौन जाने कहाँ अपना भी बसेरा होगा
बस मुकम्मल भरे मुट्ठी वही उजरत करना

मुड़ के देखूँ नहीं जर्जर सी हवेली अपनी
अब जरूरी नहीं है नाम-ए-विरासत करना

कोई ठहरा नहीं होगा तिरे दर पे ज़्यादा
तू ने चाहा है कहीं रोज सियासत करना

ज़िन्दगी क्यों बनी रहती ये तमाशा अपनी
और मुमकिन भला हो राह- ए- हिफाजत करना

साफ छुपना भी नहीं सामने आना भी मत
जंग रुक जाए जहाँ में वो हिमायत करना
-सुशीलयादव
 
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2 महीने पहले

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