रात अँधेरे सन्नाटे में ,दिन को मै वीरान सा देखूं
तेरी सूरत जब भी देखूं , तुझको मै हैरान सा देखूं
पहली -पहली बारिश का मौसम, बिजली गिरते रहती है
मन में डर का आलम होता, दहशत का तूफान सा देखूं
सपना कोई परवान न चढ़ता, नींद कहाँ अब आती है हमको
करवट में प्रियतम को सजनी, मै गिरती चट्टान सा देखूं
खंजर सबके सीने में उतरे ,मुझको कातिल ने बख्शा है
इस तपती दोपहरी में , ‘सूरज’ तेरा अहसान सा देखूं
पहचान सकोगे वापस आकर, बचपन की गलियों को
खेले कूदे साथ बढ़े हम , तुझको वैसा ही नादान सा देखूं
जिसको देखो वो ही लगा है नफरत की बस फसलें काटे
ऐसे खून के प्यासों को मै कितनी दूरी अनजान से देखूं
मुल्क यही वो हमने भी चाहा है बढ़के जी जान से अपनी
इसको फूलता- फलता मै हर कोने दिल- अरमान से देखूं
-सुशीलयादव
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