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मिजाज की तिरी नरमी जहान देखता है

                
                                                         
                            मिजाज की तिरी नरमी जहान देखता है
                                                                 
                            
पतंग दूर उड़ी आसमान देखता है

दिखा चले यहाँ तुम सब्ज बाग़ ही हरदम
मिरा उजाड़ कहीं जो मकान देखता है

मिरे नसीब का मुझको मिला नहीं अब तक
जहाँ नजर उठा हल्का समान देखता है

रियासतों की कहें, हम भी ख़ानदानी थे
पलट के दूर कहीं ख़ानदान देखता है

जो काट के कहीं फेंका परों को ही मेरा
बे क़ायदा कटे पर की उड़ान देखता है

समझ कभी नहीं पाती कहाँ तिरी दुनिया
इसी की ऊँचे कहीं बोल शान देखता है

यहाँ बिकाऊ सभी लोग राह में देखे
जमीर का हुआ सौदा इमान देखता है

तू व्यर्थ ही ये पसीना बहा दिया करता
किताब में गया वो दास्तान देखता है
-सुशीलयादव
 
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2 महीने पहले

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