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मेरी ख़ामोशी सुना करती है

                
                                                         
                            मेरी ख़ामोशी सुना करती है
                                                                 
                            
जिंदगी इतनी वफ़ा करती है

हिलने देती न तसव्वुर मेरे
चुप सी कोने में रहा करती है

हम- ख़याली की किसी उलझन में
मश्वरा को ही बुना करती है

अजनबी वो हुई जाती हरदम
सर को सदमे में धुना करती है

हम उसी के यहाँ कायल होते
जो सजाओं में जिया करती है

पर कटे हैं नहीं आसां उड़ना
बे जरूरत वो उड़ा करती है

रिश्तों की जब जिधर उधड़ी सीवन
रोज तुरपाई किया करती है
-सुशीलयादव
 
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2 महीने पहले

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