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ख़ामोश हारे हैं थके बस ज़िन्दगी से हम

                
                                                         
                            ख़ामोश हारे हैं थके बस ज़िन्दगी से हम
                                                                 
                            
दीवार बद- नुमा बने बारिश- नमी से हम

कमजोर नजरों से उठा अपना भरोसा ही
हों रु ब रु कहीं तो जरा चांदनी से हम

मौके मिले हजार हमें बात कह सकें
चुप थे जमाने की कहीं तो बेबसी से हम

तस्वीर आईने में जुदा सी है आजकल,
तंग आ चुके हैं रोज थकी रौशनी से हम।

हालात के जो लोग थे मारे, कहाँ गए?
ढूँढा किए बहुत उन्हें ही , बेकली से हम।

लश्कर वहीं पे ठहरा हुआ था इसी लिए
घबरा रहे थे शहर की बस तीरगी से हम

दरकार है हमे तिरे दीदार की कहीं
बे-चैन इल्तिजा में खड़े सादगी से हम

नाराजगी का जिक्र कहाँ तक सुशील हो
लिपटे हुए हैं लोग बिना चाशनी से हम
-सुशीलयादव
 
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2 महीने पहले

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