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बुलंदी पे है अब शरारत किसी की

                
                                                         
                            बुलंदी पे है अब शरारत किसी की
                                                                 
                            
पनाहों की मिन्नत शराफत किसी की

उसे चाहिए आदमी ख़ास अपना
जो किरदार माँगे नसीहत किसी की

नदी बाढ़ में खूब इतरा रही है
नहीं जान जाती ग़नीमत किसी की

यहाँ मशवरा कौन देता है उसको
रहा झांकता वो वसीयत किसी की

इजाजत नहीं तुम कमाओ जहाँ से
जरा तुम सुनो भी शिकायत किसी की

जो पैदा हुआ बाप बन के यहाँ फिर
न बदलो कभी ज्यादा सूरत किसी की

वही नर्म लहजा ले आगे बढेगा
कोई रोक देखे हकीकत किसी की

तड़प कर ज़माने ने देखा है 'हसरत'
हुई मुफ़्त में फिर इबादत किसी की

-सुशील यादव
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2 महीने पहले

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