गुरुवर तम के मध्य में, प्रज्ज्वल दिव्य प्रदीप।
जिनकी पावन दृष्टि से, जागे चेतन-दीप।।
अंधकार अज्ञान को, हरते हृदय उदार।
अंतर में आलोक भर, खोल ज्ञान के द्वार।।
शिष्य-हृदय की भूमि में, बोए सत्य-विचार।
पुष्पित हो जब गुरु-कृपा, हो जीवन विस्तार।।
वेद-विभा, विज्ञान का, गुरु अनुपम आधार।
उनके श्रीचरणों तले, खिलता सृष्टि-विहार।।
गुरु की निर्मल साधना, करती मन निष्काम।
अहंकार गलने लगे, प्रकटे आत्म-प्रभाम्।।
जिनके पावन स्नेह से, दृढ़ होता संकल्प।
विपदा भी पथ से हटे, मिटते सकल विकल्प।।
गुरु वाणी का एक कण, सुधा-सिन्धु सम जान।
आत्मसात् जिसने किया, पाया अमृत-ज्ञान।।
विनय, विवेक, सदाचरण, गुरु-पद के उपहार।
इनसे ही उज्ज्वल बने, व्यक्ति का व्यवहार।।
उपदेशक भर गुरु नहीं, गुरु जीवन आधार।
क्षण भर गुरु संपर्क से, खिलता हृदय-विहार।।
उऋण नहीं गुरु-ऋण कभी,कर दो सब कुछ दान।
शीश झुकाकर कीजिए, नित गुरु का सम्मान।।
-सुशील शर्मा
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