किस काम की दौलत, किस काम का संसार,
जब रूठ गए अपने, जब टूट गया प्यार।
हँसता हुआ आँगन, रोता हुआ द्वार,
किस काम की दौलत, किस काम का संसार॥
माँ की ममता सो गई, सो गया पिता का प्यार,
तीन नन्हे फूलों पर छा गया अँधियार।
किससे कहें अब दर्द को, किससे करें पुकार,
सूना पड़ा है आज घर, सूना है परिवार॥
किस काम की दौलत, किस काम का संसार,
जब रूठ गए अपने, जब टूट गया प्यार॥
दिल्ली का वह घर भी था, गाँव में था मकान,
धन-दौलत की बात में क्यों खो गया इंसान?
मुट्ठी भर मिट्टी के लिए, क्यों उठते हैं सवाल?
रिश्तों से बढ़कर हो गया क्या धन और माल?
एक भाई पहले गया, छोड़ गया निशान,
फिर पाँच जिंदगियाँ बुझीं, रोया हिंदुस्तान।
क्या था सच, क्या थी वजह, खुलने दो हर राज,
न्याय करे निष्पक्षता से, अपना देश-समाज॥
धन तो यहीं रह जाएगा, यहीं रहेंगे द्वार,
साथ न जाएँगे कभी, ऊँचे महल-दीवार।
प्रेम से सींचो जिंदगी, प्रेम ही सच्चा सार,
रिश्तों से ही रोशन है, जीवन का संसार॥
नगला पदम सिंह की धरती, करती आज पुकार,
फिर न किसी के घर में छाए, ऐसा दुख-अँधियार।
सच सामने आए सभी, न्याय मिले हर बार,
प्रेम बचा रहे दुनिया में, बचा रहे परिवार॥
किस काम की दौलत, किस काम का संसार,
प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं, प्रेम ही जीवन का सार॥
-सुशील कुमार सिंह
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