आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पिछला पन्ना

                
                                                         
                            पिछला पन्ना
                                                                 
                            
डायरी का पिछला पन्ना हूँ मैं, अनकहा, अनलिखा, थोड़ा मुड़ा हुआ ।
सारी खुशियाँ पहले पन्नों पर बाँट दीं, मेरे हिस्से आया सिर्फ़ बचा हुआ ।।

मुझ पर कोई तारीख़ नहीं, न कोई शीर्षक, न कोई नाम ।
बस एक कोना भीगा हुआ, शायद किसी आँसू का इनाम ।।

कभी कभी कलम काँप कर रुक गई यहाँ, शब्दों ने हड़ताल कर दी ।
दर्द इतना नंगा था कि, स्याही सूखी और शर्म भर दी ।।

मैं वो सच हूँ जो लिखा नहीं गया, वो अलविदा जो कहा नहीं गया ।
वो माफ़ करना जो होंठों तक आकर, फिर से दिल में ही रह गया।

अगली नई डायरी में,
फिर से नई उम्मीदें लिखी जाएँगी।
पर मैं, पिछला पन्ना, मेरे कोरेपन पर ख़ामोशी सुनी जाएगी ।।
-सूर्यपाल नामदेव "चंचल"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर