वो कितना मजबूर है,
अब तो घर से भी बहुत दूर है।
काम की तलाश में शहर आया था,
पर यहाँ भी पहले से मजदूर हैं।
बापू कर्ज़ में डूबे हैं,
पैसा घर भेजना भी ज़रूर है।
लौट भी जाऊँ तो घर कैसे जाऊँ,
हालात का ही तो कसूर है।
— सूर्यांश रीतमा
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