मुझे हारना न तो पसंद था
हारने की मुझे आदत नहीं थी
जीत पर जीत ही जब तक मिली
लगा कि हार मेरी किस्मत ही नहीं थी ||
चाहतें मिली और मिलती ही रही
लडखडा कर भी मुकाम मिलता रहा
थकान का अहसास भी नहीं था
जब तक सुकून और आराम मिलता रहा ||
पहली दफा की हार ने मेरा कत्ल सा कर दिया
बदहोश होकर खामोश कुछ बेअक्ल सा कर दिया
वक्त की करवट और कुछ निर्णय असफल हुए
सतरंगी दुनिया में कुछ धूमिल ,कुछ धवल हुए ||
अति उत्साह भी कभी अंगार भी बन जाता है
जीवन में कभी जीत कभी हार बन ही जाता है
कुछ रंग कम भी हुए तो बेरंग तो नहीं है
वक्त की स्याही से सूर्य संसार बन ही जाता है ||
-सूर्य मणि दूबे 'सूर्य'
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