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कुछ भूखे थे ,कुछ नंगे थे

                
                                                         
                            कुछ भूखे थे ,कुछ नंगे थे
                                                                 
                            
उनमें भी कुछ भिखमंगे थे
कुछ शातिर थे कुछ काबिल थे
कुछ साक्षर और कुछ जाहिल थे
कुछ कुल गोत्र से ,जगजाहिर थे
कुछ अछूत और जगबाहिर थे ||

सविधान से संसाधन का
आरक्षण से आवंटन का
अहर्ता से नियत छूट तक
फीस व्यय का शून्य मूल्य तक
कुछ वर्गों को कुछ वर्षों तक
पर चली अनवरत दर परतों पर ||

फिर क्या आखिर परिवर्तन आया
पिछडों कुचलों ने क्या पाया
भोजन वही भरे थाली में
जिसने पहले से ही खाया
भूखा अब भी सूखा तन है
अस्थि पंजर आहत काया ||

अब कैसे पिछले का हित हो
पिछडों के पिछड़े का हित हो
जाति लिखती जाती है जब
क्यों पूछो जाती क्यों नहीं है
गरीबी की जाति आखिर
किसी को जगाती ही नहीं है ||

कब तक योग्यता का हनन हो
बुद्धि और प्रतिभा का दमन हो
अनुत्तीर्ण को पद और सुविधा
विचलित मन अन्त्र:करण हो |
अयोग्य वरण योग्यता का भक्षण भी
किस लिए अब आखिर आरक्षण हो ???

 
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2 महीने पहले

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