आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नक्कारखाने में बजती

                
                                                         
                            वक्त बे- वक्त
                                                                 
                            
आओ वक्त बे-वक्त पर
पते की बात करें,
बे-वक्त आते विकारों की
बयार की बात करें।
पढ़ने के वक्त बाल श्रम में
पिसते नौनिहालों की
बात करें।
वक्त बे-वक्त सुविधाओं के
उपभोग से व्याप्त
दुविधाओं की बात करें।
वासना ऑ मत्सर की
वक्त बे-वक्त बजती
शहनाई की बात करें।

आओ इंसा की इंसा पर
बेवजह शासन करने की
फितरत की बात करें।

सियासत की बिसात
पर हाथ जोड़े खड़ी
वक्त बे-वक्त जनता
जनार्दन की बात करें।

आधी आबादी के हक
को वायदों की,
नक्कारखाने में बजती
तूती की बात करें।

युद्ध हथियारों आतंक
की वक्त बे-वक्त की
धौंस की बात करें।

आओ महाशक्तियों की
बेवक्त मधांधता और
युद्ध की उन्मादता की
बात करें।
युद्ध आतंक ऑ
विस्तारवाद की बेवक्त
तुरही की तान की
बात करें।

आओ इस संसार में
अमीर देशों की
धरती और पर्यावरण
को वक्त बे-वक्त
गरमाने और प्रदूषित
करने की बात करें।
-सूर्य कांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर