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वक्त ही

                
                                                         
                            वक्त ही,,,,
                                                                 
                            

वक्त ही हंसी
वक्त है हँसी।

वक्त की ही है
सारी लुनाई
कोई कितनी ही
करले किसी से
आशनाई।
वक्त ही है
हर शै की
कहानी,
वही बयां करता
सबकी ज़िंदगानी।

वक्त दिल है
यही शक्ल ओ सूरत
इसे नहीं बर्दाश्त
कोई ना फ़रमानी।

कितने-कितने
हुस्न ओ इश्क़ के
चाँद सितारे
झिलमिलाए,
इसके आस्मां में,
पाई बुलन्दी ऑ
शोहरत सभी ने
इसकी फ़िज़ा में।

वक्त है!?
हाँ वक्त ही है,
अज़ीब ओ ग़रीब शहंशाह
इसकी इनायत पर
आबाद ओ शाद
सारी कायनात।

कयामत के रोज़
भी यही होगा
खुदा के बाद भी
यही होगा।

वक्त ही वक्त
का शैदाई है
यही स्वागत
यही विदाई है।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
59 मिनट पहले

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