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तुम कहाँ गईं,,,

                
                                                         
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तुम कहाँ गईं
तन्हा तन्हा,
बिन तुम्हारे
हुआ जहाँ तन्हा।

ग़ज़ल तन्हा है
नज़्म तन्हा ,
बज़्म तन्हा
और ये जहाँ तन्हा।

रंज में दिल रहा
और तंज़ में,
ये जां,,, तन्हा।

जा के कब्र पे
भी तलाशा तुमको ,
यहाँ वहाँ
कहाँ कहाँ
तन्हा।
शबे रात में भी
तुम नहीं मिली,
तन्हा।
क्या बताएं
तुम्हें हम
अ जां तन्हा।

सियाह अंधेरों
में भी तलाशा
तुमको,
रिश्तों की स्याही में
तेरे हमसफ़र भी रहे
पर दोनों रहे तन्हा तन्हा।

यादों में रखा
ताउम्र तुमको।
क्या बताएं
तुम्हें अ जानें जाँ,
तू भी तन्हा है
हम भी तन्हा।

न तसव्वुर
में पाया तुमको
ना ही आती जाती
सांसों की रौशनी के
पार
नहीं मिला
कोई तुम्हारा
निशाँ तन्हा।

ढूंढ आए
तुमको
दो जहाँ में भी
पर नहीं मिली
तुम कहाँ गईं
तन्हा तन्हा,
बिन तुम्हारे
ये जहाँ तन्हा।
-सूर्यकांत शर्मा
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2 महीने पहले

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