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और उस सा साहिर कोई नहीं

                
                                                         
                            तेरी कलम से,,
                                                                 
                            

गीत ग़ज़ल नज़्म
के फूल खिलते थे
तेरी कलम से।
इबादत मुहब्बत
से सुर्ख़रूं होता
था, ज़माना!
तेरी कलम से।

अल्फ़ाज़ अहसास
के रबाब बज उठते
थे,तेरी कलम से।

आधी आबादी की
घुटती साँसे,
बिखरे जज़्बात,
गोया के सारे के सारे
अलम बयां होते थे,
तेरी कलम से।
नग़मा निगार सा कोई नहीं
और उस सा साहिर कोई नहीं
यही बताता रहा
अब्दुल हई,
ताउम्र अपनी कलम से।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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5 घंटे पहले

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