सोशल मीडिया से पहले,,,,
सोशल मीडिया से पहले
काग़ज़ की सल्तनत थी।
क़िताब गर मां बदौलत
तो अख़बार ऑ रिसाले ,
वली -ए- अहद थे।
क़िताब ऑ ख़िताब
ही गुलाब थे
उसी में ज़िंदा
जवानी के ख़्वाब थे।
लेखक- कवि
और तो और
अख़बार नवीस भी
ईद के चांद थे।
मोहल्ला ही मीडिया था
और उसका माहौल ही
सोशल मीडिया था।
माँ बाप आफ़्ताब थे
तो रिश्ते और यार
माहताब थे।
सुबह औ शाम
आपसी दुआ सलाम
से सुर्खरूं थे।
क़िताब की ताब थी
ख्वाबों ख्वाहिशों की
आब थी।
खुले खेल के मैदान थे
ताश और कैरम भी
अज़ीमुश्शान रबाब थे।
पुस्तकालयों,विद्यालयों,
मंदिरों,गुरुद्वारों,मस्जिदों में
आपसी सौहार्द औ
एक दूसरे का साथ था।
त्योहारों शादी ब्याह में,
लोक संगीत औ रक्स था,
बातचीत ऑ बहस में भी
साझा सा मीठा सा
झीना सा रूहानी
रहनुमाई सा अक्स था।
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X