सोचो के झीलों का,,,
सोचो के झीलों का शहर हो
जिसमें मुहब्बत की बहर हो।
जवानी की रवानी में
दिलकश सी ग़ज़ल हो।
वफ़ा के पहलू में
ख़ूबसूरत सी नज़्म हो।
शरीक ए हयात की
हसीन सी
खनकती हँसी हो।
सोचो के झीलों का
शहर हो।
कश्मीर ए वादी में
इंसानियत का शिकारा हो
जिसमें मुहब्बत ओ इबादत
की जुगलबंदी में
' उसका ' ही
नज़ारा हो।
'उसका ' ही तसव्वुर
हो,
और हुस्न का इश्क
को इशारा हो,
कुछ ऐसा ही जन्नत
में,
आलमी सा नज़ारा हो।
झीलों के ऐसे ही
शहर,
अब अपना गुज़ारा हो।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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