समंदर
समंदर का पानी
यूं ही खारा नहीं
हुआ है,
इसमें भी ग़मों का
गुसारा हुआ है।
समंदर का पानी
कभी ज्वार
तो कभी
भाटा हुआ है।
चाँद तो बस यूं ही
दीवाना नहीं !नहीं!
नकारा हुआ है।
समंदर के दिल में,
ज़िंदगी के कितने
राज़ जज़्ब हुए हैं,
तभी तो !तभी तो
इतना खारा हुआ है।
-सूर्यकांत शर्मा
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