रिश्ते,,
रिश्तों की ना पूछ,
जन्म से मिलते हैं
चकोर से।
जीवन के सोपानों में
बढ़ते हैं,
रिश्ते नए नकोर से।
यौवन में तो बस
चाँद औ चकोर से।
बढ़ती उम्र औ जिम्मेंदारी हिला देती है ,
इन्हीं रिश्तों की डोर सी।
सुख सुविधा और सम्मान की दौड़,
बढ़ा देती है,
इन प्यारे से रिश्तों में होड़ सी।
रिश्ते टूटते हैं
रिश्ते हो जाते हैं
बेमेल से।
उम्र भी बढ़ती रहती
पोर -पोर
रिश्ते भी चलते हैं
अपने अपने अंतिम
छोर की ओर।
जीवन की संध्या में
रह जाता है
इंसा फिर से अकेला
ढूंढता है फिर वही
रिश्तों से सराबोर की भोर सी।
ढूंढता है फिर वही
रिश्तों से सराबोर की भोर सी।
-सूर्य कांत शर्मा
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