नज़ाकत तुम्हारी
नज़ाकत तुम्हारी
सदाकत हमारी,
इल्म ए सीना से
इल्म ए सफ़ीना
तक मसाफत
है जारी।
तेरी शोख नज़रों
की बगावत
है जारी,
सजदे में हमने
शराफत है वारी।
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X