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महजबीं बानो हूँ,,,

                
                                                         
                            महजबीं बानो हूँ,,,
                                                                 
                            

महजबीं बानो हूँ मैं!
ये भी क्या अज़ीब
सी बात रही,
मैं महजबीं बानो!
अपनों को सब कुछ
देकर भी ख़ाक रही।

बचपन से लड़कपन तक
गुरबत की ख़ाक साथ रही।
बस एक बात सकूं की रही,
सात बरस की उम्र से
ताउम्र बस फ़िल्म और फ़िल्म!!!
वही थीं जो साथ रहीं।

जिसे चाहा,उसे निबाहा,
वही! हाँ !हाँ !सब कुछ लेकर भी,
सैय्याद सा साथ बस साया रहा।

किसी को ' पाकीज़ा ' से बख्शा
किसी को अदाकारी
और शायरी से रक्खा !.

पर मेरे लिए तो
सबके सब रेत से
फ़ानी रहे।

मैं महजबीं बानो!!!
कभी मुहब्बत ए साकी
तो कभी महज़
मय ए मीना रही?!
ताउम्र तन्हाई ने
कुछ यूं साथ निभाया,
के अलम ओ कलम
को भी इसने
वफ़ा का पाठ पढ़ाया।
साहिर की आधी
आबादी का ज़र्द
चेहरा और दर्द हूँ
मैं!!!!
बस मीना कुमारी का
बेनज़ीर अक्स हूँ मैं।
मीना को पाकीज़ा
समझ अब भी याद
करता है ,ज़माना।
क्या होगा परदेस
ल्योन में ?!
मैं तो आज भी इस
देश में अंजान हूँ मैं!!

हाँ मैं!! हाँ मैं?!
आज भी वही
महजबीं बानो
हूँ मैं।
-सूर्यकांत शर्मा
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एक महीने पहले

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