कभी यूं ही बात हो,,,,,
कभी यूं ही बात हो,
कुछ अपनी कुछ जग
की बात हो।
दुनिया से खाए ज़ख्मों
की बात हो,
कुछ मन में उमड़ती
घुमड़ती टीस की बात हो।
कभी यूं ही आवारा से
घूमते बचपन की बात हो।
कभी यौवन में झूमते
सपनों की बात हो।
कभी घर गृहस्थी की
गुत्थियों की बात हो।
कुछ राग विराग में
डूब कर बात हो।
कुछ भक्ति कुछ सत्संग
कुछ यम नियम योग की बात हो।
सब स्वार्थ,विकार तज कर,
मानवता की गरिमा से
परिपूर्ण बात हो।
कुछ पैकर से पैकर
कुछ रूह से रूह
की बात हो।
कभी गलबहियां डाले
दूर तक जीवन डगर में
चलते चलते ' उसे ' खोज कर,
उसी से बात करने की बात हो।
-सूर्यकांत शर्मा
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