जंग की भांग,,,
गणराज्य वर्तुल में
मची हुई है जंग!
वोट और चोट
आकलन में
घुल गई है भांग।
अब के सत्र में
क्या कनिष्ठ सभा !
क्या वरिष्ठ सभा!
क्या पक्ष?
और क्या ही विपक्ष!
बस खेल रहे
हैं दाग के फ़ाग?
कभी अतीत के
कभी वर्तमान के
दिखाए जा रहे हैं
दिए जा रहे हैं
दागे जा रहे हैं
दलीलों के दाग?!
समय चक्र भी
गवाह बना
मुंह बाए ताकता
करता ता ता थैया।
कभी आज का
विपक्ष भी
सत्ता पक्ष था?!
आज का सत्ता पक्ष
कभी विपक्ष था!?
अब तो कौरव-पांडव
द्युतसभा भी
लजा कर पदच्युत
हुई जाती है!!!
जनता बेचारी अब तो
बावरी हुई जाती है
कौन सुने कौन कहे
उसकी गाढ़ी कमाई
अब तो इस जंग की
भांग में घुली और
इस भांग में धूली
हुई जाती है????!
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X