जलवायु परिवर्तन
क्रुद्ध प्रकृति का हो
रहा नर्तन
पर मानव पूछ रहा
कहाँ ! कहाँ नर्तन।
हैं हैं कहाँ???
प्रकृति फिर बता रही
क्या देख नहीं रहे
जलवायु परिवर्तन?!
कहीं खड़ा देख रहा
जगतपिता भी
प्रकृति का विनाश कारी वर्तन।
नींद जा रही
चैन जा रहा
स्वास्थ्य भी अब
कहाँ रहा।
परिवार क्या!
हर रिश्ता भी
छीज रहा!
मानव की लालच लिप्सा से
वसुधा का मन भी खीज रहा।
अन्न वस्त्र औ ईंधन
का अतुल भंडार
भी अब चूक रहा ।
युद्ध और युद्ध
का कोलाहल ही
अब शेष रहा।
न सियासत को
गरज
न मानव को
गुरेज़
तिस पर भी
प्रकृति और बस
प्रकृति का अंतर
भीग रहा।
जलवायु परिवर्तन
का जिन्न अब ताल
पर ताल ठोक रहा।
बस मानव है कि
सब कुछ चलता है
कह कर तमाशा
देख रहा।
देखो देखो देखो
अभी भी समय है
रोक लो कैसे भी
जलवायु परिवर्तन !
रोक लो कैसे भी
जलवायु परिवर्तन ।
-सूर्यकांत शर्मा
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