हर बार एक नया प्रश्न!?!
मेरा लोकतंत्र प्रश्न पूछता है,
पुराने को छोड़
नया नकोर।
हर बार नया?!
राजनीति कहती है,
अरे फिर नया प्रश्न
मुझ से,हम से!?
उत्तर प्रत्युत्तर
होता है,
हैं! हैं,, हा... हा..।
वोट लेने,
सब्ज़ बाग़ दिखाने,
और तो और
ख़्वाब सोचने का
जिम्मा हमारा होता है।
जनता जनार्दन तो
बस उम्र दराज
बाशिंदा होता है।
पर लोकतंत्र का
वंशज है
के मानता ही नहीं।
हर बार के नए नए
प्रश्नों की झड़ी से
हैरां! परेशां,!?
सियासत मुस्कुरा कर
कहती है।
हमारा लोकतंत्र
हर नए प्रश्न से
परिपक्व होता है।
फिर धुर विरोधी
सियासत के छुटभय्यों
का नव जन गठबंधन
जवां होता है।
रोज़ रोज़ की
सियासती मुहब्बत से
नेताओं का सत्ता से
इश्क रवां होता है।
जनता औ लोकतंत्र का
प्रश्न पूछने का जज़्बा
तबाह होता है।
-सूर्य कांत शर्मा
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