आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़म भी मुस्कान बनें

                
                                                         
                            ग़म भी मुस्कान बने,,
                                                                 
                            
काश के ऐसा कोई
जंतर मिले
के ग़म भी मुस्कान बने।
इबादत हो जियारत हो
भले ही तिजारत हो।
पर फिर भी कोई ऐसा
मंतर मिले
के ग़म भी मुस्कान बने।
सियासत हो अदावत हो
भले ही कोई मुसीबत हो।
कोई ऐसा इल्म मिले
के ग़म भी मुस्कान बने।
शैतान की कचहरी हो
ज़ुल्म की अर्ज़ी हो
कोई ऐसा क़ाज़ी हो
के हैवानियत भी इंसानियत बने।
ग़ुरबत हो तंगहाली हो
भले ही जेब खाली हो।
सलाहियत औ अखिलाक़ का
सरमाया इतना ज़ियादा हो
के ग़म भी मुस्कान बने।
ज़िंदगी में कुछ ऐसा
वायज बने
के भले ही
खुदगर्ज़ी की मर्ज़ी हो
भले रिश्ते सारे फ़र्ज़ी हों।
फिर भी उसकी ऐसी नवाज़िश हो
के ग़म भी मुस्कान बने।
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर