ग़म भी मुस्कान बने,,
काश के ऐसा कोई
जंतर मिले
के ग़म भी मुस्कान बने।
इबादत हो जियारत हो
भले ही तिजारत हो।
पर फिर भी कोई ऐसा
मंतर मिले
के ग़म भी मुस्कान बने।
सियासत हो अदावत हो
भले ही कोई मुसीबत हो।
कोई ऐसा इल्म मिले
के ग़म भी मुस्कान बने।
शैतान की कचहरी हो
ज़ुल्म की अर्ज़ी हो
कोई ऐसा क़ाज़ी हो
के हैवानियत भी इंसानियत बने।
ग़ुरबत हो तंगहाली हो
भले ही जेब खाली हो।
सलाहियत औ अखिलाक़ का
सरमाया इतना ज़ियादा हो
के ग़म भी मुस्कान बने।
ज़िंदगी में कुछ ऐसा
वायज बने
के भले ही
खुदगर्ज़ी की मर्ज़ी हो
भले रिश्ते सारे फ़र्ज़ी हों।
फिर भी उसकी ऐसी नवाज़िश हो
के ग़म भी मुस्कान बने।
-सूर्यकांत शर्मा
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