एक अधूरा ख़त
हर जीव एक अधूरा ख़त है
प्रारब्ध का पुरुषार्थ को लिखा
एक अधूरा ख़त के नाम से।
भाग्य भी
कर्म भी
भूत वर्तमान
और तो और
भविष्य भी तो
बस एक अधूरे
ख़त हैं,
ज़िंदगी के नाम से।
ख़्वाब भी अधूरे
ख्वाहिशें भी अधूरी
गोया के सारी की सारी
कायनात भी कुछ कुछ
अधूरे से ख़त सी है,
उसी के नाम से।
कुछ ' उसका ' कानून
कुछ जीवन का
ककहरा
कभी फ़साना
कभी अफ़साना
सब अधूरे हैं
महज़ एक ख़त
के नाम से।
जीवन के कई
आयाम हैं
कुछ मक़ाम हैं
बस नाम से।
वो तो बताता है
पल प्रति पल
दोहराता है,
अपने अधूरे ख़त की
हिदायतें।
आप्त काम ने भी
तो छोड़ी हैं अधूरे
ख़त सी नियामतें।
गर देखो तो ज़रा
कुदरत को तुम
इत्मीनान से।
इंसा से लेकर
कुदरत की हर शै
कुछ कुछ अधूरी
है,
अज़ीम ओ शान से।
यूं तो अधूरा ही अधूरा
है,
ज़िंदगी का सफ़र
सब काम होते हैं
'उसी ' के इलहाम से।
-सूर्यकांत शर्मा
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