दोस्ती हमारी,,,
कैसे कैसे काम हो गए,
अच्छे अच्छे होम हो गए।
स्वार्थ और लफ्फाजी के दौर में
दोस्ती भी हमारी
नीलाम हो गई।
प्यार वफा दोस्ती
अब सब व्यवहारिकता के
नाम हो गई।
प्रेम त्याग समर्पण
देखो अब बीते जमाने के
आयाम हो गए।
कृतज्ञता औ कृतघ्नता
अब कुर्सी के गुलाम हो गए।
वासना ऑ भ्रष्टाचार के
किस्से अब तो कितने
आम हो गए।
यह दोस्ती भी हमारी
सुख के सिंहासन नाम हो गई।
इंसानियत की मत पूछो,
वो तो कब की
शैतान की गुलाम हो गई।
इबादत और मुहब्बत भी अब
सियासत की दुकान हो गई।
दोस्ती दोस्ती दोस्ती
यह हमारी दोस्ती!!!
भी तो देखो
हकूमत की गुलाम हो गई।
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