धूप और छाँव
धूप और छाँव
कितना अच्छा था,
मेरा गाँव।
सारे के सारे,
मिल कर सहते थे,
गमों का घाम।
छोटी छोटी बातों
में होती थी,
सुख की छाँव।
सबके बड़े अपने थे
सबके बच्चे अपने थे।
डांट फटकार देने से,
कभी कहीं नहीं,
होता था कोई घमासान।
सभी की दुख की धूप साझी,
सभी की सुख की छाँव
साझी,
चौपाल साझी।
और तो और
गांव की रोटी-बेटी,
साझी ।
ज़िंदगी की धूप छाँव
में,
हंस मनभावन चलता था।
सारी पीड़ाओं और कुंठाओं
का गठ्ठा,
हँसी ठट्ठे में चलता था।
ना सुख की छाँव बौराती थी,
ना दुख की धूप सताती थी।
कितना अच्छा था ,
कितना सुथरा था,
मेरा गाँव।
आपका मित्र
-सूर्य कांत शर्मा
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