आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सिनेमा हमारा,,,

                
                                                         
                            सिनेमा हमारा,,,
                                                                 
                            

सिनेमा हमारा,
सौ बरस से
न्यारा सा।
पर फिर भी लगता है ,
जैसे कोई दादा या
परदादा प्यारा सा।
गीत ग़ज़ल नज़्म
औ कविता,
घूमती-झूमती
जैसे हो कोई
नार नवेली सी।
संवाद,पटकथा,
कहानियाँ
जैसे निगेबांह हों
कोई दादी नानियाँ सी ।
फिल्मों के एक्शन
स्टंट और लड़ाई भिड़ाई,
ज्यों बयां हों बचपन
ऑ लड़कपन की
नादानियाँ से।
ख़्वाबों ख़्वाहिशें
रूमानियत
जैसे जवानी की
अल्हड़ मदमस्त
कहानियाँ सी ।
मुहब्बत इबादत
कसमों वादों के
और फिर नाच
रक्स ऑ रॉक्स
झूले,
जैसे के यारों की
हों छेड़खानियाँ सी।
सिनेमा हमारा
न्यारा सा प्यारा सा।
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर