सिनेमा हमारा,,,
सिनेमा हमारा,
सौ बरस से
न्यारा सा।
पर फिर भी लगता है ,
जैसे कोई दादा या
परदादा प्यारा सा।
गीत ग़ज़ल नज़्म
औ कविता,
घूमती-झूमती
जैसे हो कोई
नार नवेली सी।
संवाद,पटकथा,
कहानियाँ
जैसे निगेबांह हों
कोई दादी नानियाँ सी ।
फिल्मों के एक्शन
स्टंट और लड़ाई भिड़ाई,
ज्यों बयां हों बचपन
ऑ लड़कपन की
नादानियाँ से।
ख़्वाबों ख़्वाहिशें
रूमानियत
जैसे जवानी की
अल्हड़ मदमस्त
कहानियाँ सी ।
मुहब्बत इबादत
कसमों वादों के
और फिर नाच
रक्स ऑ रॉक्स
झूले,
जैसे के यारों की
हों छेड़खानियाँ सी।
सिनेमा हमारा
न्यारा सा प्यारा सा।
-सूर्यकांत शर्मा
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