ए जिंदगी के ख़्वाब ना जाने क्यों है
तेरी आदत सच होने से पहले
आंखों और पलकों में एक अरसा
घर बनाना...
पर अब आँखे थक गई हैं मेरी
तेरे तस्सुवर पे और पलकें हैं मजबूर ,
कुछ दर्द का पानी संभाले रखने को..
ए ख़्वाब मेरे या तो एक दम से
हकीकत हो जा या फ़िर इन घरों
से रुखसत हो जा...
..सुरजीत कुमार मनन
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