28 अगस्त की शाम थी, गोल बाजार में वही शोर था,
चाय के धुएं में घुला हुआ, वही रोज़ वाला दौर था।
एक कमेंट – उंगली से लिखा, और आग स्क्रीन से उतरी,
मसानगंज की गली में आकर, ईंट बनकर बरस पड़ी।
अक्षत और सोहेल, दोनों इसी मिट्टी में खेले थे,
आज एक ही सड़क पर, दोनों लहू में ठेले थे।
पत्थर चला तो छत नहीं देखी, किसका घर है, किसका नाम,
पुलिस की लाठी चली तो फिर, दोनों तरफ एक सा अंजाम।
आंसू गैस का धुआं उठा, तो मंदिर-मस्जिद धुंधले हुए,
एसपी-कलेक्टर दौड़े, पर सवाल वहीं पर उलझे हुए।
सोचो – जो हाथ पत्थर फेंक रहा था, कल उसी हाथ से,
कभी उसी के बाप ने, चाय पिलाई थी साथ से।
धारा 163 लगेगी, फोर्स भी हट जाएगी,
पर दरार जो दिल में आई, उसे कौन सी धारा हटाएगी?
ना हिंदू जीता उस रात, ना मुसलमान जीता है,
बिलासपुर हारा है, ये हर दुकान चीख कर कहता है।
मत बनो फॉरवर्ड की भीड़, मत बनो किसी का हथियार,
कमेंट लिखने से पहले सोचो – क्या यही है तुम्हारा प्यार?
शहर को गोल बाजार ही रहने दो, मसानगंज मत बनाओ,
पचास कदम की दूरी को, सदियों की दूरी मत बनाओ।
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