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अल्फ़ाज़ों का सफ़र

                
                                                         
                            न छेड़ो इस कहानी को, ये तो बस आग़ाज़ है,
                                                                 
                            
जिसमें तुम हो, हम हैं, और कुछ अनकहा सा राज़ है।

मत देखो यूँ कातिल निगाहों से, दिल ठहरता ही नहीं,
तेरी एक मुस्कान से मौसम सँवरता ही नहीं।

जब ज़ुल्फ़ों की घटा चेहरे पे ख़ामोशी से उतरती है,
तो चाँदनी भी तेरी अदाओं से इजाज़त माँगती है।

तौबा तो कर लें हम, मगर तेरी कसम निभाएँ कैसे,
तेरी यादों के सफ़र को अधूरा छोड़ जाएँ कैसे।

तू क़रीब आए तो साँसों में महक उतरने लगती है,
तेरी हँसी सुनकर हर ख़ामोशी गुनगुनाने लगती है।

ये इश्क़ कोई खाई नहीं, मख़मली एहसासों का सफ़र है,
जहाँ हर धड़कन तेरे नाम का लिखा हुआ ख़त है।

तेरे लम्स की आहट से रूह तक रोशन हो जाती है,
हर अधूरी दुआ तेरे मिलने से मुकम्मल हो जाती है।

चलो आज फ़ासलों को ख़ामोशी में पिघलने देते हैं,
जो राज़ बरसों से दिल में हैं, उन्हें आँखों से कहने देते हैं।

क्योंकि मोहब्बत शोर नहीं करती, बस असर छोड़ जाती है,
और तेरे साथ बिताई हर घड़ी… उम्र भर मुस्कुराती है।

आओ, इस फ़साने को थोड़ा और हसीं बनाते हैं,
जो अल्फ़ाज़ अब तक ख़ामोश थे, उन्हें धड़कनों से सुनाते हैं।
-सुरेश
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2 महीने पहले

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