आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्यार में स्वीकार

                
                                                         
                            अक्सर हाँ,
                                                                 
                            
देखा गया है - -
आत्मीय प्रेम में ,
न मिलन की - -
चाह होता है ,
न ही - -
स्वीकार करने के लिए,
बाध्यता ही l

ऐसे प्रेम को ,
नेसर्गीक प्रेम - -
कहा जाता है,
जिसमें - -
केवल ,
समर्पण की - -
भावना होता है ,
उदाहरण तोड़ पर - -
राधा और मीरा को,
ले सकते हैं - -
जिसमें ,
नायिका( प्रेमिका ) - -
नायक( प्रेमी) को ,
आराध्यदेव से - -
कम नहीं,
समझते हैं - -
जिसमें विरह,
विछुरन के सिवा - -
कुछ और ,
नहीं होता है - -
जिसमें,
दरस - परस का भी - -
संभावना,
कम ही रहता है - -
रहता है,
केवल - -
इंतजार,
केवल इंतजार - -
ही रहता है l

उसकी (नायिका की )आत्मा,
निष्तब्ध ( मुक होकर ) - -
अपने ओठो से ,
केवल - -
बुदबूदा सकती है ,
भले मेरा आत्मा - -
इस चकाचौंध,
जिंदगी में - -
वेमन होकर,
रहने का - -
प्रयास करता हो l

ना ही,
उसने कभी - -
मुझे कुछ कहा,
ना ही - -
मैंने भी ,
कुछ कहने की - -
जुर्रत ही उठाई,
यह न ही उसे - -
समझ में,
आया कि - -
स्वीकार करुं या,
ना करुं - -
ना ही मेरे ही,
समझ में आया कि - -
प्यार में ,
स्वीकार करना - -
क्या?
एक दूसरे को,
जरुरी है - -
या यों कहे तो ,
कहाँ ?
जरूरी है l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर