सच मानो तो ,
इस आसार रूपी - -
संसार में ,
हर कोई एक - -
यात्री के रुप में ,
यात्रा करने - -
लिए आते हैं l
जीवन,
रूपी राह पर - -
कितने यात्री गये,
इसका पता नहीं चला - -
या यों कहिये ,
इसका कोई - -
किसी के पास में ,
लेखा - जोखा - -
नहीं है ,
लकिन - -
उन्हीं यात्री में ,
कुछ ऐसे भी - -
लोग हुए कि ,
अपने पेरों की - -
निसानी (अपना अमिट छाप ),
छोड़ देते हैं - -
यह निसानी भले ,
मुक होता - -
फिर भी ,
बहुत कुछ - -
बताता है ,
और - -
दूसरे यात्री के लिए,
पथ प्रदर्शक का,
काम करता है - -
और,
हमारे लिए - -
प्रश्न के रुप में,
सामने आता है - -
और बार - बार ,
पूछता है कि - -
खोल इसका ,
अर्थ पंथी ( यात्री ) - -
तब पथ का,
पहचान कर लें l
जरूरी नहीं है कि ,
हर जगह ,
सुगम रास्ता या - -
पथ मिले ,
यह भी - -
निश्चित नहीं कि ,
कहाँ बाग मिले ?
या निर्जन बन का - -
सामना करना पड़े,
यह भी - -
निश्चित नहीं है ,
यह भी - -
निश्चित नहीं है कि,
कहाँ नदी - नाला ?
और - -
पहाड़ - पठार का,
सामना करना पड़े - -
और ,
चलते - चलते - -
कब यात्रा भी,
समाप्त हो जाय - -
यह भी मालुम नहीं है l
दूसरे शब्दों में ,
ये कहे तो - -
गलत साबित,
नहीं होगा कि - -
ईश्वर ने ही ,
इस जीवन रूपी - -
यात्रा पर,
भेजा है - -
हम सभी को ,
और - -
पहले से ही ,
वापसी का - -
टिकट ,
देकर भेजा है l
इसलिए ,
चिंता कम करें - -
या कम करना चाहिए,
जब तक यात्रा जारी है - -
उसे,
आनंद या - -
कृत्यग्यता से ,
बिताये - -
या अपना,
जीवन जिये l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
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