आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

महज पुतले जलाने से इस युग के रावण मरते नहीं हैं

                
                                                         
                            इस युग में अधर्मी, अधर्म करने से अब डरते नहीं हैं
                                                                 
                            
सहस्रों कुकर्म करके भी अब पाप के घड़े भरते नही हैं

कैसे पहचानेंगे आप?इस कलयुग के रावण को श्रीराम
इस दौर के दुराचारी रावण, प्रत्यक्ष वार करते नहीं हैं

मुखौटे के अंदर मुखौटे लगाकर छल करेंगे, इर्द-गिर्द
दशानन की तरह सम्मुख,अपने शीश ये धरते नहीं हैं

आइए प्रभु ! अंतर्मन में पल रहे दंभ को जला दीजिए
महज पुतले जलाने से इस युग के रावण मरते नहीं हैं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर