मरहम वाले हाथों पर ख़ंजर तो तूने तान लिया
वक़्त कभी कुछ भूल न पाता,क्यूँ ना ये भी जान लिया
मुश्किल इतना कब था रस्ता, तन्हा भी कट सकता था
क्यूँ हर एक मुसाफ़िर को हमराही तूने मान लिया
आँसू देकर हँसने वाले गैर बहुत थे दुनिया में
नादां लड़की इस ख़ातिर भी प्रीतम का अहसान लिया!!
जाने किस सैराबी में सहरा को दरिया माना था
प्यास लगी तो बूँद न निकली ज़र्रा ज़र्रा छान लिया
अबकी वक़्त लगेगा ज़्यादा, अबकी रस्ता मुश्किल है
अबकी बारी है ख़ुद अपनी, सब को तो पहचान लिया
-सुरेखा कदियान 'सृजना'
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