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अपनी छवि

                
                                                         
                            जो कुछ था सब लुटाता जा रहा हूँ,
                                                                 
                            
मैं अपनी छवि बनाता जा रहा हूँ।

तेरी उम्मीद में ज़िंदा हूँ अब तक,
वही यादें मिटाता जा रहा हूँ।

तेरे महफिल के किस्से गुनगुनाकर,
मैं अपना दर्द गाता जा रहा हूँ।

ख़ुदा ऐसा कहर बरसा है मुझ पर,
नज़र सबसे चुराता जा रहा हूँ

मैं सूरज की तरह सदियों से जलकर,
गगन में ही समाता जा रहा हूँ।
-सूरज तिवारी
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2 सप्ताह पहले

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