आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बचपन में सीखा है...

                
                                                         
                            तुम्हारे डूबने से उजला उजला सा दिन
                                                                 
                            
स्याह होने लगता है,
और फिर छा जाती है रात...
ठीक इसी तरह हम भी
धवल चांदनी में सफेद सफे को
स्याह करते हैं...
धीरे धीरे।
ताकि,
दिन के उजाले में दोगुना
चमकदार हो, कल की सुबह।
बचपन में तुमसे ही सीखा है हमने...
संपत्तौ च विपत्तौ च
महताम एक रुपता…
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर