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याद नहीं तुमको कितने तुम्हारे जफा हो गये।

                
                                                         
                            बड़ी उम्मीदों से थामा था,दामन तुम्हारा।
                                                                 
                            
गैरों की तरह तुम भी क्यों बेवफा हो गये।।
शान में आपकी ना की थी गुस्ताखी कोई,
ना जाने तुम फिर भी क्यों ख़फ़ा हो गये।।
बेतकल्लूफ किये थे जो वायदे तुमने हमसे,
वहीं वायदे अब नुकसान और नफा हो गये।।
बड़ी मेहनत से सजाई थी महफ़िल तुम्हारे लिए,
बिना कुछ कहे ही तुम क्यों यूं दफा हो गये।।
हमारी किस्मत में लिखा था जो सफर साथ में,
बो पन्ने ना जाने क्यों अब यूं ही सफा हो गये।।
अपनी यादों में रखेंगे सदा महफूज तुमको,पर
याद नहीं तुमको कितने तुम्हारे जफा हो गये।
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8 घंटे पहले

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