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बस जीवन के संदर्भों को चेतना के अधिग्रहण में लिया तो

                
                                                         
                            किसी निर्जन घाटी में
                                                                 
                            
जीवन का विशुद्ध स्वरूप दृष्टि के कगारों
पर प्रकट हुआ

पहाड़ नदी के दर्पण में अपना
चेहरा देख रहा है
नदी पहाड़ के पैर पखारती हुई शांत प्रवाहमान है
पावर्त्य में परस्पर साहचर्य का धूम उठ रहा है

घास की बूटियों ने
भी कुछ तो चित्रकारी की है कंकड़ों के कैनवास पर
ताकि वे सृजन की कला सिखा सकें आगंतुकों को

जंगल की ओर मौन,
कान लगाये कुत्तों ने अनभिज्ञ होकर ही सही,
जीवन के अस्तित्व के लिए
परस्पर संघर्ष से संबद्ध विस्तृत लेख टांग दिये हैं
वृक्षों की शाखाओं से

लैंटिना की झाड़ियों में उग आये फूल
फूल नहीं,
एक फूल में ही
सामंजस्यता बिठाये, रंग-बिरंगी ऊन से बुने गये बहुत सारे फूल हैं

इनमें से किसी ने भी मुझे
अपना परिचय नहीं दिया
नदी ,पहाड़
कंकड़,घास की बूटियों ,

कुत्तों ने किसी ने भी नहीं,

ना ही लैंटिना के जंगली फूलों ने,

बस जीवन के संदर्भों को चेतना के अधिग्रहण में लिया तो
समझ आया कि
इन सभी की अपनी-अपनी जवाबदेही है
अपने जीवन में लयात्मकता के लिए

मेरे जीवन और मेरी चाय की भी अपनी जवाबदेही है अपने संदर्भ हैं
यूं इस घाटी में रूकने भर के
-सुनीता भट्ट पैन्यूली 
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एक घंटा पहले

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