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तुम होती तो

                
                                                         
                            हर सुबह उठकर
                                                                 
                            
मैं तुम्हें
सोचता हूँ।

कप में पड़ा
तुम्हारा घिसा हुआ ब्रश
अब भी शांत है।

चाय उबलती है।
अब मैं भी
शक्कर कम लेता हूँ,
जैसा तुम कहा करती थीं।

दो कप भरता हूँ,
फिर तुम्हारा कप
खाली छोड़ देता हूँ—
रोज़ की तरह।

टेप पर
तुम्हारा गाना लगाता हूँ—
“लग जा गले कि फिर ये।”

बरामदे में आया
हाथ में कप लिए।

तुलसी में
अब नए हरे पत्ते
उग आए हैं।

वो चिड़िया
अब भी आती है,
मैंने पिछले इतवार
फ़ीडर भरा था।

अशोक के पेड़ पर
अब दो गिलहरियाँ रहती हैं।
उनके लिए
मकई के बीज लाया हूँ।

दिन ऐसे ही
धीरे-धीरे बीत जाता है।

और मैं अक्सर सोचता हूँ—
तुम होती
तो बहुत खुश होती।
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एक घंटा पहले

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