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समय की स्याही

                
                                                         
                            आज आईने की
                                                                 
                            
दीवारों पर
दरारें देखीं।

धुंधली
पुतलियों के भीतर से
एक बूढ़े क्लर्क ने झांका।

उंगलियों पर
समय की स्याही,
चेहरे पर दफ़्तर की धूल।

मेज़ पर जैसे
जवान पन्नों की
फ़ाइल पटकी।

एक पन्ना
उड़कर मेरी
तस्वीर से टकराया।

शायद वो
मुझसे कह रहा था—

"मैं आने वाली चीज़ नहीं था,
बहुत पहले से भीतर था,
दस्तक आज दी है।”
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2 महीने पहले

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