काग़ज़ की एक नाव
रेत के टीलों पर तैरती रही
नदी की तलाश में।
आइने का एक टुकड़ा
ढूँढता रहा चाँदनी
अमावस की रात में।
भोर होते ही
दोनों इंतज़ार कर रहे
एक ही ख़ामोशी के किनारे।
और सूरज
देखता रहा धरती को
आँखें मूंद कर।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X