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कालचक्र

                
                                                         
                            मेरे पापा कितने अच्छे थे, हर दुःख अपना सहते थे,
                                                                 
                            
मेरी हर छोटी-सी ख़्वाहिश पर, अपने सपने देते थे।

जब भी आँखों में आँसू थे, हँसकर उन्हें मिटाते थे,
मेरे उजले कल की खातिर, हर पीड़ा को गाते थे।

अब हर सपना अपना है, खुद ही राह बनानी है,
मेहनत की तपती धूप तले, मंज़िल स्वयं कमानी है।

बचपन कितना सस्ता था, खुशियों का व्यापार न था,
मिट्टी, कंचे, धूप, हवाएँ—इनसे बढ़कर प्यार न था।

अब तो हर मुस्कान यहाँ, पैसों में ही तौली है,
बचपन की वह खुली हँसी, किस्मत ने क्यों बोली है?

मेरे गुरु भी न्यारे थे, केवल पाठ न पढ़ाते थे,
विद्यालय से बाहर मिलकर, अपनेपन से बुलाते थे।

खुली हवा के झोंकों में, जीवन गीत सुनाता था,
हर मौसम का हर झोंका, जीने का सुख लाता था।

अब बंद कमरों में बैठकर, ठंडी साँसें भरते हैं,
प्रकृति छोड़ कृत्रिम दुनिया में, जीवन ढूँढ़ा करते हैं।

खेतों की वह सोंधी खुशबू, मन को खूब लुभाती थी,
अब रासायन की चमक मगर, सेहत रोज़ चुराती है।

कालचक्र का नियम यही—कुछ पाना, कुछ खोना है,
जो बीते पल का मान करे, उसका जीवन सोना है।

मत रो बीते कल के पीछे, आज सँभालो, कल आएगा,
संस्कारों की छाँव रहे तो, हर युग फिर मुस्काएगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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