चवन्नी को अठन्नी, अठन्नी को चवन्नी बनाया जा रहा है,
हर एक चीज़ का अब नया पैमाना बनाया जा रहा है।
कौए की कर्कश बोली से वाक़िफ़ है सारा ज़माना,
फिर भी कौए को हंस से ऊपर बताया जा रहा है।
नक़ली को असली बनाकर बाज़ार में सजाया जा रहा है,
झूठ को सच का चेहरा पहनाकर दिखाया जा रहा है।
जिसे ख़ुद नहीं मालूम मंज़िल का रास्ता भी,
उन्ही सें आज दूसरों को रास्ता बतवाया जा रहा है।
अपनों को आज गैर और गैरों को अपना बनाया जा रहा है,
रिश्तों के अर्थ को भी धीरे-धीरे मिटाया जा रहा है।
बच्चों से ‘आप’ और माँ-बाप से ‘तू’ का रिश्ता,
ये कैसा नया संस्कार हमें सिखाया जा रहा है।
जिस माँ ने उँगली पकड़कर चलना सिखाया था,
उसी हाथ को आज अकेला छोड़ा जा रहा है।
पत्नी को सीने में जगह मिल रही है मगर,
माँ-बाप को वृद्धाश्रम पहुँचाया जा रहा है।
अब हद से भी आगे यह ज़माना जा रहा है,
मूर्खों को श्रेष्ठ और ज्ञानी को दबाया जा रहा है।
गधों के सिर पर ताज सजाकर देख रहे हैं लोग,
और शेर को ही जंगल से भगाया जा रहा है।
हमसे कहो कि वक्त के साथ बदल जाओ तुम,
हमने कहा—उसूलों को कैसे बदल जाएँ हम?
दुनिया अगर ख़िलाफ़ हो जाए तो हो जाने दो,
सच की राह छोड़कर कहाँ जाएँ हम?
“तेवतिया” इतना ही कहता है इस बदलते दौर में,
हर चमकती चीज़ को सोना न समझा जाए।
ज़माना चाहे जितना बदल जाए ऐ इंसान,
बस तेरे भीतर का इंसान न बदला जाए।
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